लगातार बढ़ता वायु-प्रदूषण कहीं-न-कहीं एक चेतावनी दे रहा है कि वायु की गुणवत्ता अक्टूबर माह में लगभग 8 प्रतिशत और उत्तरोत्तर महीने में प्रदूषण का स्तर चेतावनी के स्तर को पार कर रहा है। इसमें से 15 प्रतिशत गम्भीर प्रदूषण और 51 प्रतिशत अति गम्भीर स्तर को दर्शाते हैं।
अक्टूबर में स्वभावतः ही बिहुआ, निशना, सोरेल, Mugwort और कई अनेक वनस्पतियों के पराग भी बहुतायत से मिलते हैं। वातावरण में रुक्षता स्पष्ट महसूस होती है और तब ऋतुचर्या (Seasonal regimen) जो आयुर्वेद में 5000 वर्ष पहले ही कह दी गई हो, बड़ी सार्थक लगती है।
धूम्रपान करते हुए व्यक्ति के आस-पास न रहना, ट्रैफिक भीड़ के वक्त अधिक समय बाहर न निकलना, पब्लिक बस, ट्रेन का प्रयोग करना, ट्रैफिक के पास व्यायाम न करना, सुबह-शाम की सैर में पेड़-पौधों का विशेष ध्यान रखना, कुछ व्यवसाय जैसे कंस्ट्रक्शन, खुदाई, सीवेज क्लीनिंग, Waste Management आदि जैसे व्यवसायों में सुरक्षात्मक प्रत्येक कदम, नाक पर Mask, हाथ में gloves जैसे सभी उपायों का उपयोग करना चाहिए। घर में लकड़ी-कोयले के धुएँ में खाना पकाना, कचरा जलाना जैसे साधारण वायु प्रदूषक तरीकों से बचना चाहिए। भारत सरकार की लाडली उज्जवला योजना का फायदा उठाना या जा सकता है।
बन्द रसोई घर में सूर्य की किरण और हवादार रखने की व्यवस्था भी लाभ पहुँचाती है।
फेफड़ों को संक्रमण से बचाने हेतु हाथ धोना, पानी 8-10 गिलास रोज पीना, मौसमी फलों व सब्जियों को नियमित खाना और अपने पोषण को सन्तुलित रखकर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बनाए रखना है। अपने टीकाकरण को उचित समय में पूर्ण करना, फ्लू का टीका प्रत्येक वर्ष और 65 वर्ष से अधिक उम्र में न्यूमोनिया का टीका लगवाना भी सरकारी इंद्रधनुष योजना का ही विस्तारित रूप है।
मुँह से साँस लेना, फेफड़ों के लिये हितकर नहीं होता, सतही साँसें भी फेफड़ों के एक हिस्से को ही कार्यशील रखती हैं। जबकि योग अनुसन्धान से साबित हुआ है कि गहरी, गम्भीर एवं पूर्ण साँसों का आवागमन फेफड़ों के द्वारा ऑक्सीजन का प्रयोग बढ़ा देती है। अतएव एक कुशल योग विशेषज्ञ से प्रत्यक्ष प्राणायाम को सीखकर उसका नियमित अभ्यास प्राणदायक होता है और फेफड़ों की क्रियाशीलता और कार्यमुक्तता को बढ़ाता है। प्राणायाम में साँस का अनुलोम-विलोम और ठहराव के कई तरीके सिखाए जाते हैं जिसका उद्देश्य अधिक ऑक्सीजन का रक्त में प्रवेश और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड (Co2) का निष्कासन मुख्यतः होता है।
इसके लिये यह तथ्य काफी होता है कि उदर से ली गई साँसें जो वास्तव में एक नवजात सीखकर आता है। अधिक गहरी व पूर्ण होती हैं। जबकि वक्षीय एवं clavicle से ली गई साँसें सतही होती है और फेफड़ों को पूर्ण क्रियाशील नहीं बनाती है।
इसी तरह उचित तरीके से वक्ष को सीधा अर्थात मेरुदंड को योगी की तरह सीधा कर बैठने से भी Diapragm के विस्तार से फेफड़ों को पूर्ण विस्तार हेतु जगह मिलती है।
प्राचीन अनुसन्धान में यह भी सिद्ध है कि खाने के बाद 100 कदम चलकर लेटना और बाई करवट कर सोना, खाये हुए अन्न को पचाने में सहायक कर साँसों आवागमन को निर्बाध रखती है।
अक्टूबर में स्वभावतः ही बिहुआ, निशना, सोरेल, Mugwort और कई अनेक वनस्पतियों के पराग भी बहुतायत से मिलते हैं। वातावरण में रुक्षता स्पष्ट महसूस होती है और तब ऋतुचर्या (Seasonal regimen) जो आयुर्वेद में 5000 वर्ष पहले ही कह दी गई हो, बड़ी सार्थक लगती है।
वायु प्रदूषण से बचना
धूम्रपान करते हुए व्यक्ति के आस-पास न रहना, ट्रैफिक भीड़ के वक्त अधिक समय बाहर न निकलना, पब्लिक बस, ट्रेन का प्रयोग करना, ट्रैफिक के पास व्यायाम न करना, सुबह-शाम की सैर में पेड़-पौधों का विशेष ध्यान रखना, कुछ व्यवसाय जैसे कंस्ट्रक्शन, खुदाई, सीवेज क्लीनिंग, Waste Management आदि जैसे व्यवसायों में सुरक्षात्मक प्रत्येक कदम, नाक पर Mask, हाथ में gloves जैसे सभी उपायों का उपयोग करना चाहिए। घर में लकड़ी-कोयले के धुएँ में खाना पकाना, कचरा जलाना जैसे साधारण वायु प्रदूषक तरीकों से बचना चाहिए। भारत सरकार की लाडली उज्जवला योजना का फायदा उठाना या जा सकता है।
बन्द रसोई घर में सूर्य की किरण और हवादार रखने की व्यवस्था भी लाभ पहुँचाती है।
संक्रमण से बचाव
फेफड़ों को संक्रमण से बचाने हेतु हाथ धोना, पानी 8-10 गिलास रोज पीना, मौसमी फलों व सब्जियों को नियमित खाना और अपने पोषण को सन्तुलित रखकर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बनाए रखना है। अपने टीकाकरण को उचित समय में पूर्ण करना, फ्लू का टीका प्रत्येक वर्ष और 65 वर्ष से अधिक उम्र में न्यूमोनिया का टीका लगवाना भी सरकारी इंद्रधनुष योजना का ही विस्तारित रूप है।
गहरी, पूर्ण व नियमित साँसें
मुँह से साँस लेना, फेफड़ों के लिये हितकर नहीं होता, सतही साँसें भी फेफड़ों के एक हिस्से को ही कार्यशील रखती हैं। जबकि योग अनुसन्धान से साबित हुआ है कि गहरी, गम्भीर एवं पूर्ण साँसों का आवागमन फेफड़ों के द्वारा ऑक्सीजन का प्रयोग बढ़ा देती है। अतएव एक कुशल योग विशेषज्ञ से प्रत्यक्ष प्राणायाम को सीखकर उसका नियमित अभ्यास प्राणदायक होता है और फेफड़ों की क्रियाशीलता और कार्यमुक्तता को बढ़ाता है। प्राणायाम में साँस का अनुलोम-विलोम और ठहराव के कई तरीके सिखाए जाते हैं जिसका उद्देश्य अधिक ऑक्सीजन का रक्त में प्रवेश और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड (Co2) का निष्कासन मुख्यतः होता है।
इसके लिये यह तथ्य काफी होता है कि उदर से ली गई साँसें जो वास्तव में एक नवजात सीखकर आता है। अधिक गहरी व पूर्ण होती हैं। जबकि वक्षीय एवं clavicle से ली गई साँसें सतही होती है और फेफड़ों को पूर्ण क्रियाशील नहीं बनाती है।
उचित उठना-बैठना-लेटना
इसी तरह उचित तरीके से वक्ष को सीधा अर्थात मेरुदंड को योगी की तरह सीधा कर बैठने से भी Diapragm के विस्तार से फेफड़ों को पूर्ण विस्तार हेतु जगह मिलती है।
प्राचीन अनुसन्धान में यह भी सिद्ध है कि खाने के बाद 100 कदम चलकर लेटना और बाई करवट कर सोना, खाये हुए अन्न को पचाने में सहायक कर साँसों आवागमन को निर्बाध रखती है।

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