Friday, March 6, 2020

Sexually transmitted infections (STIs)

Sexually transmitted infections (STIs) are infections that spread primarily through person-to-person sexual contact. STIs are of public health concern not only because of their high prevalence worldwide, but also because of their potential to cause serious and permanent complications in infected people who are not treated in a timely and effective way. These complications and sequelae include infertility, fetal wastage, ectopic pregnancy, anogenital cancer and premature death, as well as neonatal and infant infections. In addition STIs are known to facilitate human immunodeficiency virus infection/acquired immunodeficiency syndrome (HIV/AIDS).
There are more than 30 different sexually transmissible bacteria, viruses and parasites. The most common conditions they cause are gonorrhoea, chlamydial infection, syphilis, trichomoniasis, chancroid, genital herpes, genital warts, human immunodeficiency virus (HIV) infection and hepatitis B infection.
Several STIs, particularly HIV and syphilis, can also be transmitted from mother to child during pregnancy and childbirth, and through blood products and tissue transfer.
According to World Health Organization (WHO) more than 1 million people acquire a sexually transmitted infection (STI) every day globally. WHO estimates that 500 million new cases of one of four curable STIs (chlamydia, gonorrhoea, syphilis and trichomoniasis) occur each year worldwide.
STIs/RTIs (reproductive tract infections) are an important public health problem in India. A community based STI/RTI prevalence study conducted during 2002-03 by the Indian Council of Medical Research (ICMR) has shown that 6% of the adult population in India has one or more STI/RTI. This amounts to occurrence of about 30-35 million episodes of STI/RTI every year in the country.
 A large proportion of new STIs occur amongst adolescents and young adults who may not be aware that they are infected, which can have a negative impact upon their future sexual and reproductive health.

Teeth Decaying

दांतों की सड़न – कारण, लक्षण, बचाव व उपचार

दांतों की सड़न के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार
Tooth Decay Problems in Hindi

Contents [show]
English में एक कथन है –
Oral health is overall health.
मतलब मुख का स्वास्थ्य ही समपूर्ण स्वास्थ्य का सूचक है।
दांत
स्वस्थ दांत= स्वस्थ शरीर
आज हम मुख के स्वास्थ्य से जुडी हुई एक common problem के बारे में जानेंगे और सीखेंगे कि कैसे थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता से हम दांतों की सड़न और तकलीफ से बच सकते हैं।

दातों की सड़न / 

हमारे दांत कैल्शियम ,फॉस्फोरस और अन्य खनिज से मिलजुलकर बने होते है।हलाकि इंसानी शारीर का सबसे कठोर भाग उसके दांत ही होते है परन्तु लापरवाही और awareness ना होने की वजह से येह भी सड़न का शिकार हो जाते हैं।
दांतों की सड़न की वजह से tooth pain होता है और खाना खाने में तकलीफ होती है, सामने के दांत सड़ जाएँ तो मुख की सुन्दरता में दाग लग जाता है और आत्मविश्वाश में कमी आती है।

दांतों की सड़न – कारण, लक्षण, बचाव व उपचार

दांतों की सड़न के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार
Tooth Decay Problems in Hindi

Contents [show]
English में एक कथन है –
Oral health is overall health.
मतलब मुख का स्वास्थ्य ही समपूर्ण स्वास्थ्य का सूचक है।
दांत
स्वस्थ दांत= स्वस्थ शरीर
आज हम मुख के स्वास्थ्य से जुडी हुई एक common problem के बारे में जानेंगे और सीखेंगे कि कैसे थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता से हम दांतों की सड़न और तकलीफ से बच सकते हैं।

दातों की सड़न / Tooth Decay in Hindi

हमारे दांत कैल्शियम ,फॉस्फोरस और अन्य खनिज से मिलजुलकर बने होते है।हलाकि इंसानी शारीर का सबसे कठोर भाग उसके दांत ही होते है परन्तु लापरवाही और awareness ना होने की वजह से येह भी सड़न का शिकार हो जाते हैं।
दांतों की सड़न की वजह से tooth pain होता है और खाना खाने में तकलीफ होती है, सामने के दांत सड़ जाएँ तो मुख की सुन्दरता में दाग लग जाता है और आत्मविश्वाश में कमी आती है।
तो आईये दांतों की सड़न के कारण और इससे कैसे बचा जाये इसके बारें में जानते हैं।

दांतों की सड़न का कारण 

दांतों की सड़न एक बहुत ही आम समस्या है परन्तु यह हमरे मुंह के अन्दर होती है और किसी को दिखती नहीं इसलिए हम इसे नजर अंदाज करते जाते है।
दांतों की सड़न के 3 मुख्य कारण होते है –
  • खान पान
वह खाद्य प्रदार्थ जिनमे कार्बोहायड्रेट और शक्कर की मात्रा अधिक हो उससे दांतों की सड़न होने का खतरा ज्यादा रहता है, अगर खाद्य प्रदार्थ चिपचिपा हो जैसे की टॉफ़ी, मिठाई, पोटैटो चिप्स तो फिर सड़न का खतरा और भी ज्यादा रहता है।
  • दांतों की सफाई और उनकी बनावट
दांतों की ठीक तरह से सफाई ना करना सड़न को न्योता देने जैसा है। रोजाना दांतों को दो वक्त साफ़ करना जरुरी है। इस तरह से से आप मुंह मे मौजूद बैक्टीरिया की बढ़त को कम कर सकते है और साथ ही फंसे हुए खाद्य प्रदार्थ को भी साफ़ कर सकते हैं। दांतों को साफ़ रखने के लिए आपको सहीं तरीके से ब्रश करना, फ्लॉस करना और माउथवाश का प्रयोग करना चाहिए।
  • मुख में मौजूद बैक्टीरिया
कोई कितनी भी सफाई करे हर किसी के मुह में बैक्टीरिया होते हैं। परन्तु हम अपने मुख की सफाई कितनी अच्छी तरह से करते है यह तय करता है की बैक्टीरिया की तादात बढेगी या कम होगी। और अगर तादात बढेग तो क्या उनके लिए सड़न पैदा करने वाले कारक मौजूद है।
जैसे ही आप खाना बंद करते है बैक्टीरिया अपना काम शुरू कर देता है, वो दांतों पर एक तरह की सफ़ेद परत बनाता है जिसे हम प्लाक कहते हैं। यही प्लाक बैक्टीरिया का घर होता है और नियमित दो समय ब्रशिंग करके इसे बनने से रोका जा सकता है। मुख में मौजूद बैक्टीरिया को एसिड बनाने के लिए कार्बोहायड्रेट और शक्कर की जरुरत होती है, जिससे दांतों में सड़न होती है।

दांतों के सड़न के लक्षण / Symptoms of Tooth Decay in Hindi

दांतों की सड़न का पहला लक्षण है दांत की उपरी सतह ( इनेमल) पर भूरा दाग जैसा लगना। फिर यह दाग थोडा बड़ा होता है एक छेद का रूप लेता है और उस जगह पर खाना फसना शुरू हो जाता है। खाना फसने से सड़न की प्रकिर्या तेज हो जाती है और दांत का छेद बड़ा हो जाता है। जब येह छेद थोडा गहरा हो जाता है और अंदरूनी सतह (डेंटिन) में पहुच जाता है तब हमे ठंडे या मीठे से कनकनाहट होने लगती है। जब सड़न इससे भी ज्यादा अन्दर चला जाता है तब वह पल्प (दांतों की नस) तक पहुँच जाता है और इसे संक्रमित कर देता है, और तब हमें दांतों में जोरदार दर्द होता है।

अर्थराइटिस

 अर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है। जिसमें हमारे जो़ड़ो में दर्द के साथ-साथ अकड़न के अलावा सूजन भी आ जाती है। इस बीमारी में जोड़ों में गठिया बन जाती है। जिसके कारण गठिया रोग भी कहा जाता है। अर्थराइटिस  कई तरह के होता है। इसके खई लक्षण ऐसे होते है जो पहले से ही दिखने लगते है। अगर आपने इन्हें समय़ से ध्यान दिया तो इस खतरनाक बीमारी से समय में निजात पा सकते है।
लेकिन जरुरी नहीं कि अर्थराइटिस के लक्षण इसी के ही हो। वास्तव में आपको क्या बीमारी है वो टेस्ट के बाद ही पता चलती है


अर्थराइटिस  के लक्षण
  • अगर आपको बिना चोट या पहले के दर्द के बिना 1 सप्ताह से ज्यादा दर्द रहता है तो यह अर्थराइटिस का कारण हो सकता है। इससे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • अगर आपको ज्वांइट्स में सूजन आ गई है। जो कि किसी चोट के कारण न हो तो यह अर्थराइटिस का ही संकेत हो सकता है।
  • अगर जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द के कारण आपको अपने रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो रही हो, तो एक बार आपको अर्थराइटिस की जांच करवा लेनी चाहिए।
  • अगर आपके जोड़ों में सूजन हो और वह छूने में दर्द हो रहा है तो यह भी गठिया का ही एक लक्षण है।
  • अगर किसी चीज को उठाते समय कमर में अधिक दर्द हो। कोई दवा लेने के बाद भी आराम नहीं है तो समझ लें कि यह गठिया का ही एक लक्षण है।
  • आपको अपनी बाजुओं और कमर में थोड़ी देर बैठे रहने के बाद ही दर्द का अहसास होने लगे। खासतौर पर सुबह नींद से उठने के बाद।
  • अचानक आपको जोड़ो में दर्द होने लगे।

Digestive Problem

बार-बार कुछ भी उल्टा-सीधा खाते रहने से पाचन तंत्र पर बुरा असर होता है। पाचन तंत्र (Bad Digestive System) खाने को ऊर्जा में बदलकर शरीर को बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है। पाचन क्रिया दुरुस्त नहीं होने से भोजन ठीक तरह से नहीं पचता है। आपको अपच, गैस, उल्टी, पेट दर्द, पेट में सूजन आदि की समस्या हो सकती है। खराब पाचन क्रिया से आपको कई गंभीर बीमारीयां हो सकती हैं। आखिर कैसे जानें कि आपकी पाचन प्रक्रिया खराब हो रही है? परेशान होने की जरूरत नहीं है, आप कुछ संकेतों के जरिए जान सकते हैं कि आपका पाचन तंत्र खराब हो गया है, जिसका इलाज करवाना बहुत जरूरी है। जानें, बैड डाइजेशन या खराब पाचन तंत्र के कुछ लक्षणों के बारे में जिसे पहचानकर आप पाचन क्रिया में सुधार कर सकते हैं। पाचन तंत्र खराब (Digestive Problem in hindi) होने के आम लक्षण इस प्रकार हैं…

शरीर और सांसों की दुर्गंध 

जब शरीर से विषाक्‍त पर्दाथ बाहर नहीं निकलते हैं, तो शरीर से दुर्गंध आने लगती है। अधिक पसीना, पैरों से बदबू आना खराब हाजमे का संकेत है। शरीर से न निकलने वाले विषाक्‍त पदार्थ रक्‍त धारा में जाकर स्किन में फसे रह जाते हैं, जिससे शरीर की गंध खराब हो सकती है। ऐसे में शरीर से डिटॉक्स दूर करने वाले फूड्स का सेवन करना चाहिए। कई बार सांसों से अधिक बदबू आना भी पाचन तंत्र खराब (Digestive Problem in hindi)  होने के संकेत होते हैं। दो बार ब्रश करने के बावजूद भी सांसो से बदबू आ रही है, तो तुंरत चेकअप करवाएं।

त्‍वचा की समस्‍या

अधिक दिनों तक पेट खराब रहने या साफ नहीं होना यानी पाचन क्रिया की समस्या। जब ऐसा होता है, तो इससे त्वचा को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में मुंहासे, सोरायसिस या एक्जिमा की समस्या हो सकती है। आप चाहें तो इस बारे में अपने गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें।

स्वस्थ फेफड़ों के प्रति हमारा दायित्व

लगातार बढ़ता वायु-प्रदूषण कहीं-न-कहीं एक चेतावनी दे रहा है कि वायु की गुणवत्ता अक्टूबर माह में लगभग 8 प्रतिशत और उत्तरोत्तर महीने में प्रदूषण का स्तर चेतावनी के स्तर को पार कर रहा है। इसमें से 15 प्रतिशत गम्भीर प्रदूषण और 51 प्रतिशत अति गम्भीर स्तर को दर्शाते हैं।

अक्टूबर में स्वभावतः ही बिहुआ, निशना, सोरेल, Mugwort और कई अनेक वनस्पतियों के पराग भी बहुतायत से मिलते हैं। वातावरण में रुक्षता स्पष्ट महसूस होती है और तब ऋतुचर्या (Seasonal regimen) जो आयुर्वेद में 5000 वर्ष पहले ही कह दी गई हो, बड़ी सार्थक लगती है।



वायु प्रदूषण से बचना


धूम्रपान करते हुए व्यक्ति के आस-पास न रहना, ट्रैफिक भीड़ के वक्त अधिक समय बाहर न निकलना, पब्लिक बस, ट्रेन का प्रयोग करना, ट्रैफिक के पास व्यायाम न करना, सुबह-शाम की सैर में पेड़-पौधों का विशेष ध्यान रखना, कुछ व्यवसाय जैसे कंस्ट्रक्शन, खुदाई, सीवेज क्लीनिंग, Waste Management आदि जैसे व्यवसायों में सुरक्षात्मक प्रत्येक कदम, नाक पर Mask, हाथ में gloves जैसे सभी उपायों का उपयोग करना चाहिए। घर में लकड़ी-कोयले के धुएँ में खाना पकाना, कचरा जलाना जैसे साधारण वायु प्रदूषक तरीकों से बचना चाहिए। भारत सरकार की लाडली उज्जवला योजना का फायदा उठाना या जा सकता है।

बन्द रसोई घर में सूर्य की किरण और हवादार रखने की व्यवस्था भी लाभ पहुँचाती है।

संक्रमण से बचाव


फेफड़ों को संक्रमण से बचाने हेतु हाथ धोना, पानी 8-10 गिलास रोज पीना, मौसमी फलों व सब्जियों को नियमित खाना और अपने पोषण को सन्तुलित रखकर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बनाए रखना है। अपने टीकाकरण को उचित समय में पूर्ण करना, फ्लू का टीका प्रत्येक वर्ष और 65 वर्ष से अधिक उम्र में न्यूमोनिया का टीका लगवाना भी सरकारी इंद्रधनुष योजना का ही विस्तारित रूप है।

गहरी, पूर्ण व नियमित साँसें


मुँह से साँस लेना, फेफड़ों के लिये हितकर नहीं होता, सतही साँसें भी फेफड़ों के एक हिस्से को ही कार्यशील रखती हैं। जबकि योग अनुसन्धान से साबित हुआ है कि गहरी, गम्भीर एवं पूर्ण साँसों का आवागमन फेफड़ों के द्वारा ऑक्सीजन का प्रयोग बढ़ा देती है। अतएव एक कुशल योग विशेषज्ञ से प्रत्यक्ष प्राणायाम को सीखकर उसका नियमित अभ्यास प्राणदायक होता है और फेफड़ों की क्रियाशीलता और कार्यमुक्तता को बढ़ाता है। प्राणायाम में साँस का अनुलोम-विलोम और ठहराव के कई तरीके सिखाए जाते हैं जिसका उद्देश्य अधिक ऑक्सीजन का रक्त में प्रवेश और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड (Co2) का निष्कासन मुख्यतः होता है।

इसके लिये यह तथ्य काफी होता है कि उदर से ली गई साँसें जो वास्तव में एक नवजात सीखकर आता है। अधिक गहरी व पूर्ण होती हैं। जबकि वक्षीय एवं clavicle से ली गई साँसें सतही होती है और फेफड़ों को पूर्ण क्रियाशील नहीं बनाती है।

उचित उठना-बैठना-लेटना


इसी तरह उचित तरीके से वक्ष को सीधा अर्थात मेरुदंड को योगी की तरह सीधा कर बैठने से भी Diapragm के विस्तार से फेफड़ों को पूर्ण विस्तार हेतु जगह मिलती है।

प्राचीन अनुसन्धान में यह भी सिद्ध है कि खाने के बाद 100 कदम चलकर लेटना और बाई करवट कर सोना, खाये हुए अन्न को पचाने में सहायक कर साँसों आवागमन को निर्बाध रखती है।

लगातार ईयरफोन के इस्तेमाल से हो सकती हैं ये बीमारियां

जीवन में टेक्नालजी की बढ़ती भूमिका अपने साथ कई तरह की बीमारियां भी लेकर आई है. इन्हीं में शामिल हैं ईयरफोन या हेडफोन, जिसके ज्यादा देर तक इस्तेमाल से आपको अपने कानों से सम्बन्धित समस्या का सामना करना पड़ सकता है. एक रिसर्च के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन एक घंटे से अधिक वक्त तक 80 डेसीबेल्स से अधिक तेज आवाज में संगीत सुनता है, तो उसे सुनने में संबंधित समस्या का सामना करना पड़ सकता है या फिर वह स्थायी रूप से बहरा हो सकता है.

अगर आप भी ईयरफोन का ज्यादा देर तक इस्तेमाल करते हैं तो समय रहते संभल जाइये क्योंकि ये ना केवल आपके कानों को नुकसान पहुंचाता है बल्कि आपके शरीर को भी कई तरह से नुकसान पहुंचाता है.